काफ़िर मैं काफ़िर था,फिर गैर, फिर असमाजिक तत्व, फिर आतंकीउससे भी दिल नहीं भरातो लिबरल, कम्युनिस्ट, टुकड़े - फुकरे गैंग बनामैं यह सब इसीलिए था क्योंकि मैं फ़ासिस्ट नहीं था,क्योंकि मुझे लड़ना था,मेरे मुल्क के लोगों के हक़ मेंमेरे हक़ की लड़ाई का नाम उसने राजद्रोह रख दियाऔर जंग ?जंग का नाम राष्ट्रप्रेमऔर इश्क़ ?इश्क जिहादी हो गयाऔर कलम ?गोली की नोक पर खड़ा व्यक्ति कलमऔर मैं ?मैं तो उन मर्दो से मोहब्बत में था,तमाम उम्र से जिन्हें भी थे मर्द पसंदमैं तो पैदाइश काफ़िर था। ~ शैली मिश्रा अन्य कविता - "औरत के हुक़ूक़ में - शैली मिश्रा जरूर पढ़े - click here प्रसिद्द कवि ओम व्यास की "पिता" पर लिखी सुंदर कविता JMC Study Hub के youtube channel पर जरूर सुने - click here