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मैं काफ़िर था ( Kaafir ) – शैली मिश्रा

काफ़िर ( Kaafir ) , ये शब्द कुछ लोगों को या यूँ कहूं की हमारे समाज में ज़्यादातर को नाग़वार सुनाई देता है। "ख़ुदा या ईश्वर के अस्तित्व से ही इनकार करने वाला शक़्स काफ़ीर" क्या बस यहीं तक सिमित है।इसका अर्थ, शायद "हर चीज़ को सामने होता देख फिर उसी की सच्चाई पर सवाल उठाने वाला भी काफ़िर हो सकता है" या काफ़िर शब्द वो लेबल भी हो सकता है, जो असल मुद्दे से भटकाने के लिए कमज़ोरों और तानाशाही से तंग लोगों के हक की लड़ाई लड़ रहे क्रांतिकारियों पर लगाया गया हो। ख़ैर मुद्दा हल तो नहीं होता बस उछाला और भटकाया जाता है उन पियादों के ज़रिये जिन्हें उनके पीछे बैठा कोई तानाशाह हुक्म देता है। ऐसे में शिकार होते हैं वो जो क्रन्तिकारी थे और अब काफ़िर बना दिए गए। इसी सच्चाई पर अपने मन की व्यथा अपनी एक नज़्म में लिखती है बनारस की शैली मिश्रा ।

काफ़िर

मैं काफ़िर था,
फिर गैर, फिर असमाजिक तत्व, फिर आतंकी
उससे भी दिल नहीं भरा
तो लिबरल, कम्युनिस्ट, टुकड़े – फुकरे गैंग बना
मैं यह सब इसीलिए था क्योंकि मैं फ़ासिस्ट नहीं था,
क्योंकि मुझे लड़ना था,
मेरे मुल्क के लोगों के हक़ में
मेरे हक़ की लड़ाई का नाम उसने राजद्रोह रख दिया
और जंग ?
जंग का नाम राष्ट्रप्रेम
और इश्क़ ?
इश्क जिहादी हो गया
और कलम ?
गोली की नोक पर खड़ा व्यक्ति कलम
और मैं ?
मैं तो उन मर्दो से मोहब्बत में था,
तमाम उम्र से जिन्हें भी थे मर्द पसंद
मैं तो पैदाइश काफ़िर था।

~ शैली मिश्रा

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