कभी यूँ भी तो हो – डिम्पल सैनी

कभी यूँ भी तो हो

कि चमकते सूरज से चुटकी भर स लेकर किसी के अगाध दुःख के

द की जगह रखकर उसे नितांत सुख में परिवर्तित कर दिया जाये…

कभी यूँ भी तो हो

कि किसी अपने की देह को छोड़कर जाती उस रूह का हम जाते-जाते हाथ पकड़ पाये

और जाने से पहले उसे आख़िरी बार कसकर गले लगा पाये…

कभी यूँ भी तो हो

कि पीली पड़ चुकी उन एल्बम से जिसकी यादों की भीनी-भीनी महक हर रोज़ आती है ,

उन दूधिया बादलों में कभी-कभार उस शख़्स का हँसता-खिलखिलाता चेहरा भी दिख जाये…

कभी यूँ भी तो हो

कि किसी क़मीज़ पर बटन टांकने जितना सरल हो ,

डायरी के किसी कोने में अंतिम पलों सरीख़े वाक्य बग़ैर कांपे इन उँगलियों से लिखे जाये…

कभी यूँ भी तो हो

कि किसी बच्चे की कल्पना में इस आसमां का रंग सच में गुलाबी हो जाये

और उसके नन्हें-से अंगूठे और उंगली के बीच दबे चॉक से बनी वो गोरैया स्लेट पर सच में जीवंत होकर दाने चुगने बैठ जाये…

कभी यूँ भी तो हो

कि मेरी किताबों के बीच बुकमार्क के तौर पर रखे गए मेपल के पत्ते हर दिन रंग बदल-बदल कर

कभी हरे ,पीले , सफेद तो कभी लाल हो जाये मग़र सूखकर कभी बिखर ना पाये…

कभी यूँ भी तो हो

कि जिस प्रकार उसके रुठने पर हम उसे मनाते हैं कभी तो अपने रूठे बच्चों को मनाने वो भी यहां आये…

ये धरती ये नदिया ये अंबर ये सब जिसका है कभी वो ख़ुदा ख़ुद भी अपने इस घर आये…

इस जुगनी के कई सवालों के जवाब किसी भी इंसान के पास नहीं इनके जवाब देने वो ईश्वर खुद यहां आये…

कभी यूँ भी तो हो….कभी यूँ भी तो हो….

~ डिम्पल सैनी (जुगनी)

रेडियो से जुड़ी आपकी पुरानी यादें ताज़ा करदेगी ये कविता youtube पर सुने – click here

Tribute for Lata Mangeshkar ji – click here

दीपावली के पावन त्यौहार पर एक सुन्दर कविता – click here

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *