कभी यूँ भी तो हो – डिम्पल सैनी
कभी यूँ भी तो हो की वो गुज़रा बचपन वापस आजाये, कभी यूँ भी हो
कभी यूँ भी तो हो की वो गुज़रा बचपन वापस आजाये, कभी यूँ भी हो
मेहबूब के आशिक़ जिस तरह जिससे हम प्यार करते हैं उससे सिर्फ हम ही प्यार
ये रेडियो (radio) ही है साहब जो मन बहलाता था। रेडियो के सम्मान में और
बुराई पर अच्छाई की जीत होने के बाद आईं खुशियों का ये त्यौहार दीपावली, दीयों
काफ़िर ( Kaafir ) , ये शब्द कुछ लोगों को या यूँ कहूं की हमारे
हम अपने जज़्बात अपनी ज़िंदगी में वैसे तो हर शक़्स के साथ बांट लेते हैं,

औरत के हुक़ूक़ में सड़क पर, नुक्क्ड़ पर, चाय की टपरी से झोंपड़े के टीले पर, कविताओं की

कविता “एक दूजे का साथ तुम देते रहना के माध्यम से में ये समझना चाहती
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