हिम्मत खड़ी मिले मुझे पापा के नाम में

हम अपने जज़्बात अपनी ज़िंदगी में वैसे तो हर शक़्स के साथ बांट लेते हैं, बस नहीं बांट पाते हैं तो अपने पिता के साथ। पिता, पिता जी, बाउजी, पापा, डैड, मुख़्तलिफ़ नाम हैं उस रिश्ते के, जो अपना सब कुछ निछावर कर देता है बस अपने बच्चों के होठों की मुस्कराहट के ख़ातिर। मुझे लगता है आम बोल-चाल की भाषा तो कभी इस लायक नहीं बनेगी की हम उसके ज़रिये अपने दिल की बात कभी पापा से कह पाएं। हाँ, कविताओं के पास ये ताकत जरूर है। ताकत हर तरह के जज़्बात को बयां करने की और जब कुछ बोला नहीं जाता तब लिखा जाता है। वो जो दिल में था, वो जो कहना आसान नहीं था। कुछ ऐसा ही अपने शब्दों के माध्यम से लिखा है रायसेन के देवनगर में रहने वाले युवा कवि दीपक मेहरा ने..
पापा कविता

रहती नहीं कोई भी कमी इंतज़ाम में,
महिमा अनन्त है जो लिखूं इस पैगाम में
होता हूँ परेशां मैं घिरुं मुश्किलों से जब,
हिम्मत खड़ी मिले मुझे पापा के नाम में

है प्यार इतना कि ये समंदर भी है कहाँ
उनके हृदय के सामने अम्बर भी है कहाँ
एहसान तुझपे पापा के इतने हैं कि दीपक,
चुकता नही कर पायेगा कोई भी दाम में
हिम्मत खड़ी मिले मुझे पापा के नाम में

दुनिया के मोह जाल से डरता था मैं कभी
अजनबियों के संसार से डरता था मैं कभी
जब से रखा पापा ने मेरे सिर पे हाथ को,
डरता नही हूँ अब कभी कोई भी काम में,
हिम्मत खड़ी मिले मुझे पापा के नाम में

~ दीपक मेहरा

पिता पर प्रसिद्ध कवि पंडित ओम व्यास की सुन्दर कविता जरूर सुने – click here

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