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तस्वीर: दिखता हुआ सच

कभी हाथों से कागज़, दीवार, पत्थर आदि के चेहरे पर बनी पेंटिंग के रूप में, तो कभी आधुनिकता की कोख़ से जन्म लिए कैमरे से कैद किये गए उन पलों के रूप में जिनको हमने नाम दिया तस्वीर। उसने अपने अलग-अलग रूपों में कभी इतिहास, कभी वर्तमान, तो कभी अपनी कल्पनाओं से भविष्य की चाही-अनचाही सूरत को पेश किया। जिसने अपने आप को सच दिखाता हुआ आईना बनाया तो कभी इसी तस्वीर का सहारा लेकर लोगों ने दूसरों की आंखों में धूल झोंकते हुए खुद के झूठ को सच में तब्दील भी किया। लेकिन आखिर में जो सच था वो सामने आता रहा। तस्वीर ने हर युग में लोगों के शब्दों को बेहतर ढंग से पेश करने का काम किया। तस्वीर जिसकी सीरत थी मौन होकर भी हर बात को चींख-चींख कर कहना उसने अपनी उस सीरत को कभी नहीं खोया और तस्वीर की इसी सीरत को देखते हुए मुकव्विनों ने यानी रचनाकारों ने अपनी रचनाओं को रचा। जिम रचानाओं में से आज हम आपके लिए शायरों द्वारा लिखी  शायरियों को लेकर आए हैं। 

तस्वीर शब्द पर शायरी

 
जिसकी आवाज़ में सिलवट हो, निगाहों में शिकन
ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़े जाते ।
 ~ गुलज़ार
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रंग, ख़ुश्बू और मौसम का बहाना हो गया
अपनी ही तस्वीर में चेहरा पुराना हो गया ।
 ~ ख़ालिद गनी
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रफ़्ता रफ़्ता सब तस्वीरें धुँदली होने लगती हैं
कितने चेहरे एक पुराने एल्बम में मर जाते हैं ।
 ~ ख़ुशबीर सिंह शाद
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लारियों से ज्यादा बहाव था तेरे हर एक लफ़्ज़ में,
मैं इशारा नही काट सकता तेरी बात क्या काटता ।
कोई भी तो नही जो मेरे भूखे रहने पर उदास हो,
जेल में तेरी तस्वीर होती तो हस कर सज़ा काटता ।
 ~ तहज़ीब हाफी
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तस्वीर के दो रुख़ हैं जाँ और ग़म-ए-जानाँ
इक नक़्श छुपाना है इक नक़्श दिखाना है ।
~ जिगर मुरादाबादी
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उसकी तस्वीरें हैं दिलकश तो होंगी,
जैसी दीवारें हैं वैसा साया है ।
एक मैं हूँ जो तेरे क़त्ल की कोशिश में था, 
एक तू है जो जेल में खाना लाया है ।
 ~ तहज़ीब हाफी
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यार तस्वीर में तन्हा हूँ मगर लोग मिले, 
कई तस्वीर से पहले कई तस्वीर के बाद ।
भेज देता हूँ मगर पहले बता दूँ तुझ को,
मुझसे मिलता नहीं कोई मेरी तस्वीर के बाद ।
 ~ उमैर नजमी
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कुछ पल के लिये खुलता है कैमरे का शटर,
और कैद हो जाते हैं हम ज़िंदगी भर के लिये ।
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मैं खींच नहीं पाया तस्वीर
झूठे बर्तन उठाते बचपन की
भीख मांगते युवक की,
रिक्शा खींचते बूढ़े की,
मैं खींच नहीं पाया तस्वीर ।
चेचक के दाग से
सड़कों के गाल पर पड़े गड्ढों की
मैं खींच नही पाया तस्वीर ।
रिश्वत के भार से गिरे पुल की
मैं नही चाहता था दुनिया देखे,
मेरे भारत की ऐसी तस्वीरों को
मगर कब तक छुपाया जा सकता है
चेहरे के इन दागों को ।
____________________________
 
गरीबी बेचारी गरीब रह गई,
तस्वीरें भूखों की हजारों कमा गई ।
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JMC साहित्य के कॉलोम हर शब्द पर शायरी में आज तस्वीर शब्द पर शायरियों का संग्रह अपने पढ़ा। उम्मीद है कि इस संग्रह से आपकी खोज पूरी हुई होगी। JMC साहित्य के लेख, संग्रह आदि में सुधार हेतु अपने महत्वपूर्ण सुझाव जरूर दें।

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