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ईद: खुशियों का त्यौहार

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ईद पर शायरी

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जहां मज़हब होता है, जहां अलग-अलग मान्यताएं होती हैं, वहाँ होते है त्यौहार, त्यौहार जो आपसी प्रेम और भाईचारे का संदेश लेके आते हैं। फिर वो चाहे ईद की मिठास हो या दीवाली की रौनक। हर त्यौहार घर के दरवाजों पर खुशियों की दस्तक देने आता है। अगर बात करें, हिज़री कैलेंडर के दसवें महीने के पहले दिन मनाया जाने वाला त्यौहार, जिसे हम ईद कहते हैं, जो शिर-खुरमा, खजूर और कई मिठाइयों में अपनी मिठास को समेट के लाता है जो इस बार भी आया है लेकिन आज, दरवाजों पर खुशियों की दस्तक़ की जगह, देहलीज़ पर एक सन्नाटा पसरा हुआ नजर आता है जो मानो चीख़-चीख़ कर ये कहे रहा हो कि अब तुम्हारे सभी त्यौहारों की रंगत जा चुकी है,जो अब कभी वापस लौटके नही आने वाली। लेकिन इसी के बीच कहीं दूर से एक उम्मीद नज़र आती है जो बताती है कि अकीदतमंदों अपनी अक़ीदत पर, अपनी प्रार्थनाओं पर भरोसा करो। वो ईश्वर, वो खुदा, वो भगवान मौजूद है। जो सब देख रहा है, जो सब ठीक करेगा।
ख़ैर इस वक़्त हालात बहुत नाज़ुक है और इन्हींं हालातों को बखूबी बयान करती हैं रचनाकारों की रचनाएं जो ईद मुबारक़ भी देती हैं और एसे माहौल में फासला रखने की हिदायत भी। तो चलिए शुरू करते हैं सिलसिला इस बार की ईद पर शायरों के कलाम का –

ईद पर शायरों के कलाम 

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ग़मो से दर्द से ज़ख्मों से तलवारों से डरते हैं ।
मोहब्बत क्या करेंगे वो जो अंगारों से डरते हैं ।
 
दशहरा, ईद, बैसाखी, दिवाली अब भी आते हैं ।
मग़र अब हाल ये है लोग त्यौहारों से डरते हैं ।
~ मंज़र भोपाली
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तुझको मेरी न मुझे तेरी ख़बर जाएगी 
ईद अब के भी दबे पावँ गुज़र जाएगी ।
~ ज़फर इक़बाल
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ईद ख़ुशियों का दिन सही लेकिन
इक उदासी भी साथ लाती है
 
ज़ख़्म उभरते हैं जाने कब-कब के
जाने किस-किस की याद आती है
~ फ़रहात एहसास
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ऐ हवा तू ही उसे ईद-मुबारक कहियो,
और कहियो कि कोई याद किया करता है ।
~ त्रिपुरारि
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मुस्कुराओ की ईद हो जाए
गुनगुनाओ की ईद हो जाए ।
 
अपने छोटे-बड़ों की सब गलतियां,
भुल जाओ की ईद हो जाए ।
 
बे दिली से न यूं गले से लगो,
दिल मिलाओ की ईद हो जाए
 
जा के अपने बड़ों के क़दमों में,
सर झुकाओ की ईद हो जाए ।
~ हनीफ़ दानिश इंदौरी
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क़त्ल की सुन के ख़बर ईद मनाई मैंने
आज जिस से मुझे मिलना था गले मिल आया ।
~ दाग़ देहलवी
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ख़ुशी ये है कि मेरे घर से फ़ोन आया है
सितम ये है कि मुझे ख़ैरियत बताना है ।
 
नमाज़ ईद की पढ़ कर मैं ढूँढता ही रहा,
कहीं दिखे कोई अपना गले लगाना है ।
~ सईद सरोश आशिफ
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कहींंंंं है ईद की शादी कहीं मातम है मक़्तल में,
कोई क़ातिल से मिलता है कोई बिस्मिल से मिलता है ।
~ दाग़ देहलवी
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किसी विसाल की आहट, किसी उम्मीद का दिन
फ़िज़ा में घुलते हुए नग़मा-ऐ-सईद का दिन
 
अब इस से बढ़ के मुबारक भी वक़्त क्या होगा
तुम्हारी याद का मौसम है और ईद का दिन ।
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मिल के होती थी कभी ईद भी दिवाली भी,
अब ये हालत है कि डर-डर के गले मिलते हैं
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माना कि आज “कोई उम्मीद भर नहीं आती, कोई सूरत नज़र नहीं आती” लेकिन फिर भी अपने अंदर एक उम्मीद को जगह दीजिये क्योंकि उम्मीद पर दुनिया कायम है। सब जल्द ही ठीक हो जायेगा और यह वक़्त ही तो है गुज़र जाएगा। JMC साहित्य की टीम आप सभी के लिए दुआ करती है और अपनी शुभकामनाएं देती है कि आप सबको ईद मुबारक हो…
ईद पर लिखे गए शायरों के विचारों का संग्रह और उन्हें प्रस्तुत करने का तरीका । उम्मीद है कि आपको पसंद आया होगा। अपने सुझाव हमें जरूर लिख कर भेजे।