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कभी यूँ भी तो हो की वो गुज़रा बचपन वापस...
मेहबूब के आशिक़ जिस तरह जिससे हम प्यार करते हैं...
ये रेडियो (radio) ही है साहब जो मन बहलाता था।...
बुराई पर अच्छाई की जीत होने के बाद आईं खुशियों...