पुस्तक समीक्षा – उपन्यास ‘शर्ट का तीसरा बटन’ बालपन में चल रहे मन को झकझोर देने वाले सवालों का जवाब है
गांव का जीवन, बरगद की झूलती जड़े, बालपन का कोमल मन, कड़वे सच से आहत, विद्रोह का प्रयास।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस:- हिन्दी साहित्य में नारी विमर्श एंवम भारतीय लेखिकाओं की प्रशस्ति
8 मार्च के दिन महिलाओं के अतुलनीय योगदान को सम्मानित करने के लिए विश्वभर में अंतरराष्ट्रिय महिला दिवस मनाया जाता है। इस लेख के माध्यम से, हम हिन्दी साहित्य के परिपेक्षय से महिलाओं की वर्तमान स्थिती एवं साहित्य में हुए नारी विमर्श पर चर्चा करेंगें ।
List of Newspaper Terminologies
In the world of journalism, newspapers have their own unique language filled with terms and jargon that might seem like a foreign tongue to the uninitiated. From ‘above the ‘Masthead’ to ‘byline,’ join us on a journey through the lexicon of newspapers, gaining a deeper understanding of the inner workings of this vital communication medium. Whether you’re a journalism student or just curious about how newspapers come to life, this post will provide you with the newspapers have their own unique language filled with terms and jargon
भारतीय समाज का आईना बन चुके सोप ओपेरा का इतिहास
वर्तमान में भारत का हर नागरिक चाहें वह युवा, महिला या वृद्ध क्यू ना हो टेलीविजन शो का आदी आवश्य हो गया जैसे ही शाम के सात बजते हैं पूरा भारतीय समाज टेलीविजन के सामने आकर बैठ जाता है। कहीं ना कहीं सोप ओपेरा के अंदर इतनी ताकत होती है कि वह पूरे परिवार को एक साथ बैठ कर हँसने, रोने, औऱ वक़्त बिताने पर मज़बूर कर देता है।
क्या टैगोर भी रहे फ़िल्म जगत का हिस्सा ?
साहित्य कृतियों का इतिहास के पन्नो से सीधा पर्दे पर उतरते देखना एक कलाकार के लिए अभूति से कम नहीं माना जाता है । ऐसे मे रविंद्र नाथ टैगोर के द्वारा लिखित साहित्य पर फिल्मों का बनना फिल्म जगत के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। भारत को उनका जन-गण-मन देने वाले रविंद्र नाथ टैगोर के न जाने कितने अभिलेख अभी पर्दे पर उतरने बाकी है ।
Who Banned Films And Pulled From Theatres ?
A film or movie is not just a fictional story it is also a reality check for society. People are exposed to all kinds of emotions in cinema within a short span of 2 to 3 hours. When a movie is released it has both negative and positive effects on society and inspires in many ways.
जानिए संघर्ष की कहानी:-15 वर्ष की आयु में तय किया नोबल पुरस्कार का सफ़र।
वर्तमान में मलाला युसुफ़ज़ई किसी परिचय कि मोहताज़ नहीं है। जिस उम्र में बच्चे खिलौने के लिए जि़द करते हुए नज़र आते है,उस उम्र में मलाला युसुफ़ज़ई मानवधिकारो के लिए लड़ते हुए आ रही है ,जो आज हम सभी के लिए प्रेरणाश्रोत है।
जाने भास्कर का इतिहास :- 1958 से आरंभ हुआ दैनिक भास्कर का सफ़र
नवम्बर 2019 में वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ न्यूजपेपर्स एंड न्यूज पब्लिशर्स के रिपोर्ट के अनुसार दैनिक भास्कर को 43 लाख से ज्यादा प्रतियों के साथ दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा अखबार बना ।