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क्या टैगोर भी रहे फ़िल्म जगत का हिस्सा ?

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Rashmi S Dubey

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बहुमुखी प्रतिभा के धनी बांग्ला परिवार में जन्म लेने वाले गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर की कृतियों की चर्चा सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि देश- विदेश तक मशहूर हुई । उन्हें आज कौन नहीं जानता है, नोबेल पुस्‍कार से सम्‍मानित टैगोर ने राष्ट्र गान ही नहीं ,फिल्म जगत को ऐसी कई एहम कृतियां भी प्रदान करी है। जिसका जिक्र आज भी समय के साथ चलता चला जा रहा है । बंगाली और हिंदी दोनो भाषाओं में इनकी कृतियों पर फिल्में बनी है ।

रविंद्र नाथ टैगोर का फ़िल्म जगत में योगदान-

साहित्य कृतियों का इतिहास के पन्नो से सीधा पर्दे पर उतरते देखना एक कलाकार के लिए अभूति से कम नहीं माना जाता है । ऐसे में रवींद्र नाथ टैगोर के द्वारा लिखी हुई साहित्यों पर फिल्मों का बनना फिल्म जगत के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। टैगोर की कृतियों पर हिन्दी और बंगाली दोनो भाषाओं में फिल्में बन चुकी है-

सबसे पहले हिंदी भाषा में सन् 1927 में ‘सेक्रिफाइज‘ बनी । जिसके बाद 1947 में रवींद्र नाथ टैगोर की कृति नौका डूबी पर नितिन बोस ने ‘मिलन’ बनाई। बिमल रॉय ने 1961 में टैगोर की कृति पर फिल्म ‘काबुलीवाला’ नामक फ़िल्म बनाई । इस फिल्म में मुख्य अभिनेता के रूप में बलराज साहनी ने कार्य किया है । 1965 में ‘डाकघर’ नामक फ़िल्म बनी जिसमें बलराज साहनी और सचिन ने उम्दा अभिनय किया है । 1971 में सुदेंधु रॉय ने ‘उपहार‘ नामक फ़िल्म बनाई। 1991 में रवींद्र नाथ की कृति ‘कशुधित पशान’ पर बनी फ़िल्म जिसका नाम ‘लेकिन’ था। 1997 में टैगोर की कृति ‘चार अध्याय’ पर कुमार साहनी ने ‘चार अध्याय’ और 2001 में ‘नौका डूबी’ पर रितुपर्णो घोष ने ‘कशमकश’ बनाई थी।

रवींद्र नाथ टैगोर के साहित्य पर बंगाली सिनेमा में भी फिल्मों का निर्माण हुआ। जैसे-

रवींद्र नाथ टैगोर के साहित्य पर बनी फ़िल्मों के कुछ दृश्य
  • 1932 में ‘नातिर पूजा’ ( टैगोर द्वारा निर्देशित)
  • 1947 में नौकाडूबी।
  • 1957 में काबुलीवाला।
  • 1960 में क्शुधिता पशान ।
  • 1961 में ‘तीन कन्या’, 1964 में ‘चारुलता’, 1985 में घारे-बारे (सत्यजीत रे के द्वारा)
  • 2003 में ‘चोखेर बाली’ ( रितुपर्णो घोष)
  • 2004 में ‘शष्ति’ (चासी नजरूल इस्लाम)
  • 2006 में शुवा ( चासी नजरूल इस्लाम द्वारा)
  • 2008 में ‘चतुरंगा’ ( सुमन मुखर्जी)
  • 2012 में एलार चार अध्याय ( टैगोर की कृति चार अध्याय पर आधारित)
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